उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aankhon se meri kaun mere KHwab le gaya

आँखों से मेरी कौन मिरे ख़्वाब ले गया

آنکھوں سے میری کون مرے خواب لے گیا

शायर: Parveen Shakir8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आँखों से मेरी कौन मिरे ख़्वाब ले गया
चश्म-ए-सदफ़ से गौहर-ए-नायाब ले गया

तूफ़ान-ए-अब्र-ओ-बाद में सब गीत खो गए
झोंका हवा का हाथ से मिज़राब ले गया

कुछ ना-ख़ुदा के फ़ैज़ से साहिल भी दूर था
कुछ क़िस्मतों के फेर में गिर्दाब ले गया

उस शहर-ए-ख़ुश-जमाल को किस की लगी है आह
किस ग़म-ज़दा का गिर्या-ए-ख़ूनाब ले गया

वाँ शहर डूब डूब गए और इधर ये बहस
ख़ुम ले गया है या ख़म-ए-मेहराब ले गया

कुछ खोई खोई आँखें भी मौजों के साथ थीं
शायद उन्हें बहा के कोई ख़्वाब ले गया

ग़ैरों की दुश्मनी ने न मारा मगर हमें
अपनों के इल्तिफ़ात का ज़हराब ले गया

ऐ आँख अब तो ख़्वाब की दुनिया से लौट आ
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया