उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye basti jaani-pahchani bahut hai

ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है

یہ بستی جانی پہچانی بہت ہے

शायर: Iftikhar Arif6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये बस्ती जानी-पहचानी बहुत है
यहाँ वा'दों की अर्ज़ानी बहुत है

शगुफ़्ता लफ़्ज़ लिक्खे जा रहे हैं
मगर लहजों में वीरानी बहुत है

सुबुक-ज़र्फ़ों के क़ाबू में नहीं लफ़्ज़
मगर शौक़-ए-गुल-अफ़्शानी बहुत है

है बाज़ारों में पानी सर से ऊँचा
मिरे घर में भी तुग़्यानी बहुत है

न जाने कब मिरे सहरा में आए
वो इक दरिया कि तूफ़ानी बहुत है

न जाने कब मिरे आँगन में बरसे
वो इक बादल कि नुक़सानी बहुत है