उर्दू शायरी · ग़ज़ल

azab-e-wahshat-e-jaan ka sila na mange koi

अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई

عذاب وحشت جاں کا صلہ نہ مانگے کوئی

शायर: Iftikhar Arif5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अज़ाब-ए-वहशत-ए-जाँ का सिला न माँगे कोई
नए सफ़र के लिए रास्ता न माँगे कोई

बुलंद हाथों में ज़ंजीर डाल देते हैं
अजीब रस्म चली है दुआ न माँगे कोई

तमाम शहर मुकर्रम बस एक मुजरिम मैं
सो मेरे बा'द मिरा ख़ूँ-बहा न माँगे कोई

कोई तो शहर-ए-तज़ब्ज़ुब के साकिनों से कहे
न हो यक़ीन तो फिर मो'जिज़ा न माँगे कोई

अज़ाब-ए-गर्द-ए-ख़िज़ाँ भी न हो बहार भी आए
इस एहतियात से अज्र-ए-वफ़ा न माँगे कोई