उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yaqin ko sinchna hai KHwabon ko palna hai

यक़ीन को सींचना है ख़्वाबों को पालना है

یقین کو سینچنا ہے خوابوں کو پالنا ہے

शायर: Zafar Gorakhpuri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यक़ीन को सींचना है ख़्वाबों को पालना है
बचा है थोड़ा सा जो असासा सँभालना है

सवाल ये है छुड़ा लें मसअलों से दामन
कि इन में रह कर ही कोई रस्ता निकालना है

जहान-ए-सौदागरी में दिल का वकील बन कर
इस 'अह्द की मुंसिफ़ी को हैरत में डालना है

जो मुझ में बैठा उड़ाता रहता है नींद मेरी
मुझे अब उस आदमी को बाहर निकालना है

ज़मीन ज़ख़्मों पे तेरे मरहम भी हम रखेंगे
अभी गड़ी सूइयों को तन से निकालना है

किसी को मैदान में उतरना है जीतना है
किसी को ता-'उम्र सिर्फ़ सिक्का उछालना है

ये नाव काग़ज़ की जिस ने नद्दी तो पार कर ली
कुछ और सीखे अब इस को दरिया में डालना है