उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bulandi se utare ja chuke hain

बुलंदी से उतारे जा चुके हैं

بلندی سے اتارے جا چکے ہیں

शायर: Zafar Gorakhpuri6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बुलंदी से उतारे जा चुके हैं
ज़मीं पर ला के मारे जा चुके हैं

दिखाए बीच दरिया कौन रस्ता
फ़लक ख़ाली है तारे जा चुके हैं

मआ'नी क्या रहे ख़ुद्दारियों के
कि दामन तो पसारे जा चुके हैं

ये पूरा सच है तुम मानो न मानो
कि अच्छे दिन तुम्हारे जा चुके हैं

भनक तक भी न पहुँची उस की हम तक
हमारे दिन गुज़ारे जा चुके हैं

अब इस अंधे कुएँ को बंद कर दो
कई बच्चे हमारे जा चुके हैं