उर्दू शायरी · ग़ज़ल

yahi kafi tha tawajjoh ko haTane ke liye

यही काफ़ी था तवज्जोह को हटाने के लिए

یہی کافی تھا توجہ کو ہٹانے کے لیے

शायर: Ozair Yusuf9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

यही काफ़ी था तवज्जोह को हटाने के लिए
ज़ख़्म होते थे मिरे पास दिखाने के लिए

झुकना पड़ता है मुझे ज़ख़्म खुजाने के लिए
इतनी ज़ंजीर कहाँ पाँव उठाने के लिए

लोग समझे हैं मोहब्बत को लिए बैठा हूँ
हादसे और भी होते हैं सुनाने के लिए

मुंतज़िर घर में मिरे कोई नहीं होता था
देर करता था फ़क़त देर से आने के लिए

कोई तेहवार मिरे वास्ते तेहवार नहीं
इक तिरा हिज्र ही काफ़ी है मनाने के लिए

भूल जा दोस्त मिरे अपनी मोहब्बत दे कर
क़र्ज़ लेता है यहाँ कौन चुकाने के लिए

कील तस्वीर हथौड़ी को लिए फिरता हूँ
कोई दीवार नहीं मिलती लगाने के लिए

एक लम्हे में मिरे बोझ के नीचे आ कर
साँस निकला है मिरा जान छुड़ाने के लिए

रब्त टूटा था मिरी आँख के खुलते ही 'उज़ैर'
फिर नए ख़्वाब में उतरा था पुराने के लिए