उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apne hone pe na hone ka nishan rakkha hai

अपने होने पे न होने का निशाँ रख्खा है

اپنے ہونے پہ نہ ہونے کا نشاں رکھا ہے

शायर: Ozair Yusuf7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपने होने पे न होने का निशाँ रख्खा है
साफ़ ज़ाहिर हूँ मगर ख़ुद को निहाँ रख्खा है

सोच सकता हूँ तुझे देख नहीं सकता मैं
क्या बताऊँ कि तुझे मैं ने कहाँ रख्खा है

वो मिरी सम्त में आएगा पलटने के लिए
मैं ने इम्कान से आगे भी गुमाँ रख्खा है

आँख खुलती है किसी और जहाँ में मेरी
बंद आँखों में कोई और जहाँ रख्खा है

सिलसिला-वार मिरे ख़्वाब में आ कर उस ने
किस तवातुर से कहानी को रवाँ रख्खा है

उस ने रख्खा है मुझे साथ तो अपने लेकिन
दिल ही रख्खा है मिरा दिल में कहाँ रख्खा है

बे-ख़याली ने उठा कर ये मिरा पाँव 'उज़ैर'
जिस जगह कोई नहीं पहुँचा वहाँ रख्खा है