उर्दू शायरी · ग़ज़ल

andar bhi tha KHala so KHala dekhta raha

अंदर भी था ख़ला सो ख़ला देखता रहा

اندر بھی تھا خلا سو خلا دیکھتا رہا

शायर: Ozair Yusuf7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अंदर भी था ख़ला सो ख़ला देखता रहा
मैं आसमाँ की सम्त खड़ा देखता रहा

इक मैं कि देखता रहा उस में ख़ुदा को और
इक और शख़्स मुझ में ख़ुदा देखता रहा

मेरी नशिस्त उस से ज़रा दूर थी मगर
मैं उस के साथ ख़ाली जगह देखता रहा

आँखों में इस क़दर थी मिरे तीरगी कि मैं
जलते हुए दिये को बुझा देखता रहा

अन्दर पुराने ज़ख़्म की सूरत बिगड़ गई
मैं चेहरा आइने में खड़ा देखता रहा

कुछ और देखने को नहीं था कि देखता
सो वक़्त को गुज़रता हुआ देखता रहा

वो मुझ से पूछता रहा कैसे हो तुम 'उज़ैर'
और मैं हवा में जलता दिया देखता रहा