उर्दू शायरी · ग़ज़ल

gaya nahin tha jahan se main ho ke aaya tha

गया नहीं था जहाँ से मैं हो के आया था

گیا نہیں تھا جہاں سے میں ہو کے آیا تھا

शायर: Ozair Yusuf6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गया नहीं था जहाँ से मैं हो के आया था
तिरे ख़याल ने जाने कहाँ बुलाया था

तिरी तलाश में भटका तो याद आने लगा
वो एक घर जो तिरे वास्ते बनाया था

मैं घूरता हूँ बुझा कर दिया-सलाई को
कि भूलता हूँ इसे किस लिए जलाया था

तिरी ख़मोशी उधर मसअला बनी हुई थी
उदासियों ने इधर भी क़दम जमाया था

वो रौशनी जो बदन से नहीं गुज़रती थी
उसी ने साए को दीवार से लगाया था

वही उदासी मिरे साथ साथ चलती है
तिरी नज़र से जो आँखों में भर के लाया था