उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo teri nigahon ka aalam jo mast-kun-o-mastana tha

वो तेरी निगाहों का 'आलम जो मस्त-कुन-ओ-मस्ताना था

وہ تیری نگاہوں کا عالم جو مست کن و مستانہ تھا

शायर: Zaheen Shah Taji7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो तेरी निगाहों का 'आलम जो मस्त-कुन-ओ-मस्ताना था
मय-ख़ाने का मय-ख़ाना था पैमाने का पैमाना था

आबादी-ए-दिल का 'आलम भी इक ख़्वाब था या अफ़्साना था
जब आँख लगी काशाना था जब आँख खुली वीराना था

मौक़ूफ़ थी दिल की हालत पर वीरानी भी आबादी भी
वीराना भी काशाना था काशाना भी वीराना था

आदाब-ए-तमाशा से वाक़िफ़ कब शैख़-ओ-बरहमन थे वर्ना
बुत-ख़ाने में भी का'बा था का'बे में भी बुत-ख़ाना था

जब 'इश्क़ में गुम अतराफ़ हुईं जब सोज़ में महव जिहात हुईं
जो शम' थी वो परवाना था वो शम' थी जो परवाना था

कुछ तेरी ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं के असरार खुले तो मस्ती में
दीवाना था वो होश में था जो होश में था दीवाना था

क्या जाने किस ने क्या समझा अंदाज़-ए-बयान-ए-'ज़हीन' था क्या
हर लफ़्ज़ में एक हक़ीक़त थी हर लफ़्ज़ मगर अफ़्साना था