उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apni dhun mein hun KHayal-e-ma-siwa se kya gharaz

अपनी धुन में हूँ ख़याल-ए-मा-सिवा से क्या ग़रज़

اپنی دھن میں ہوں خیال ماسوا سے کیا غرض

शायर: Zaheen Shah Taji6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

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अपनी धुन में हूँ ख़याल-ए-मा-सिवा से क्या ग़रज़
आश्ना से क्या ग़रज़ ना-आश्ना से क्या ग़रज़

बात कुछ दिल की सुनी ऐ निस्बत-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात
हो बुतों से बे-नियाज़ी तो ख़ुदा से क्या ग़रज़

ज़िंदगी का अव्वल-ओ-आख़िर थी वो पहली नज़र
इब्तिदा से क्या त'अल्लुक़ इंतिहा से क्या ग़रज़

मुद्द'आ-आमोज़ है हुस्न-ए-तमन्ना-आफ़रीं
इस दिल-ए-बे-मुद्द'आ को मुद्द'आ से क्या ग़रज़

'उम्र-भर उस की जफ़ा को हम वफ़ा समझा किए
क्या ख़बर वाबस्ता थी उस बे-वफ़ा से क्या ग़रज़

हुस्न-ए-मुस्तग़ना की हम ने बात रख ली ऐ 'ज़हीन'
वर्ना ‘इश्क़-ए-बे-ग़रज़ को इल्तिजा से क्या ग़रज़