उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo KHun-e-insan se hath jin ke sane hue hain

वो ख़ून-ए-इंसाँ से हाथ जिन के सने हुए हैं

وہ خون انساں سے ہاتھ جن کے سنے ہوئے ہیں

शायर: saabir jauharii7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो ख़ून-ए-इंसाँ से हाथ जिन के सने हुए हैं
पयाम्बर अम्न-ओ-आश्ती के बने हुए हैं

करूँगा तूफ़ाँ के बाद उन की मिज़ाज-पुर्सी
घमंड से चूर पेड़ जितने तने हुए हैं

वो लोग अब चाँद को बसाने की फ़िक्र में हैं
जो इस ज़मीं के अमाँ के दुश्मन बने हुए हैं

थे आसमाँ पर तबाहियों के जो हल्के बादल
वो अहद-ए-नौ में न जाने कैसे घने हुए हैं

किसी भी इक मसअले का हल आज तक न निकला
जो ज़िंदगी के थे मसअले सब बने हुए हैं

ख़ुदा ने जन्नत की सारी आसाइशें तो दी थीं
ये सारे दुख ज़िंदगी के तेरे जने हुए हैं

उन्हें मनाने में वक़्त ज़ाएअ' करो न 'साबिर'
अना के बंदे जो बे-सबब ही तने हुए हैं