उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kis hunar-mandi se qatl-e-tirgi karte hain log

किस हुनर-मंदी से क़त्ल-ए-तीरगी करते हैं लोग

کس ہنر مندی سے قتل تیرگی کرتے ہیں لوگ

शायर: saabir jauharii7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किस हुनर-मंदी से क़त्ल-ए-तीरगी करते हैं लोग
मेरा काशाना जला कर रौशनी करते हैं लोग

जाने कैसा शहर है ये मौत की आग़ोश में
रह के भी हर वक़्त जश्न-ए-ज़िंदगी करते हैं लोग

मैं फ़सील-ए-शब पे रौशन करता हूँ दिल का चराग़
गरचे मेरे रास्ते में तीरगी करते हैं लोग

या-इलाही गुल्सितान-ए-ज़िंदगी की ख़ैर हो
जो नहीं करना है अब अक्सर वही करते हैं लोग

दोस्ती का गिर गया मेआ'र कितना आज-कल
सिर्फ़ मक़्सद के लिए अब दोस्ती करते हैं लोग

मुझ को क्या मालूम लफ़्ज़ों के बरतने का हुनर
मुझ से बेहतर शहर-ए-फ़न में शायरी करते हैं लोग

ज़िंदगी के हाथ से मजबूर हो कर आज-कल
ख़ुद-कुशी हर वक़्त 'साबिर-जौहरी’ करते हैं लोग