उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo jis se pyar main diwana-war karta raha

वो जिस से प्यार मैं दीवाना-वार करता रहा

وہ جس سے پیار میں دیوانہ وار کرتا رہا

शायर: Ibrahim Noori15 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो जिस से प्यार मैं दीवाना-वार करता रहा
वो पीठ पीछे मिरे मुझ पे वार करता रहा

जो शख़्स बंदगी-ए-किर्दगार करता रहा
वो ख़ुद को दहर में यूँ ज़ी-वक़ार करता रहा

'अजीब शख़्स था वो जब तलक रहा ज़िंदा
ख़िज़ाँ की रुत में भी जश्न-ए-बहार करता रहा

हुसूल जिस का मिरी दस्तरस से बाहर था
उसी की चाह में दिल बे-क़रार करता रहा

ये मेरी जान है क़ुर्बान उस ग़ज़ल-ख़्वाँ पर
फ़राज़-ए-दार पे जो ज़िक्र-ए-यार करता रहा

ख़याल क्या है तुम्हारा हमारे बारे में
सवाल मुझ से कोई बार बार करता रहा

किसी ने उस को बिठाया नहीं सवारी पर
मुसाफ़िरों को जो बंदा सवार करता रहा

दयार-ए-ग़ैर में रह कर भी तुझ को ख़ाक-ए-वतन
हमेशा याद दिल-ए-ख़ाकसार करता रहा

नसीहतों की जिसे ख़ुद बहुत ज़रूरत थी
वो दूसरों को नसीहत हज़ार करता रहा

मिरी निगाह में मंज़िल थी रोज़-ए-अव्वल से
सो ज़ब्त-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार करता रहा

किसी का मुझ से ये कहना भला लगा मुझ को
कहाँ था तू मैं तेरा इंतिज़ार करता रहा

इसी पे बारिश-ए-ने'मत मुदाम होती रही
जो शुक्र-ए-ने'मत-ए-परवरदिगार करता रहा

जो शहर भर में न था ए'तिबार के क़ाबिल
ये दिल उस पे ही क्यों ए'तिबार करता रहा

उसे घमंड था अपने अमीर होने पर
सो मेरे सामने डॉलर शुमार करता रहा

निखरता जाएगा फ़न बज़्म-ए-इस्तिआ'रा का
जो 'नूरी' चश्म-ए-करम शहरयार करता रहा