उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi diya sar-e-dosh-e-hawa jala dunga

कोई दिया सर-ए-दोश-ए-हवा जला दूँगा

کوئی دیا سر دوش ہوا جلا دوں گا

शायर: Ibrahim Noori5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई दिया सर-ए-दोश-ए-हवा जला दूँगा
हवा-ए-शहर-ए-सितम को मैं यूँ सज़ा दूँगा

अदू को अपने मैं इस तरह से रुला दूँगा
कि तीर खा के सर-ए-रज़्म मुस्कुरा दूँगा

अगर किसी ने मुझे हौसला नहीं बख़्शा
मैं अपने आप को ख़ुद बढ़ के हौसला दूँगा

जो ख़ुद को हुस्न का पैकर समझता रहता है
मैं अब की बार उसे आइना दिखा दूँगा

पलट के आएगा वो मेरे पास ऐ 'नूरी'
जो दरमियाँ से फ़सील-ए-अना गिरा दूँगा