उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jis ki KHatir sajai mahfil hai

जिस की ख़ातिर सजाई महफ़िल है

جس کی خاطر سجائی محفل ہے

शायर: Ibrahim Noori12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जिस की ख़ातिर सजाई महफ़िल है
क्यों रसाई उसी की मुश्किल है

ज़िंदगी क्या है मैं बताता हूँ
एक मजमूआ'-ए-मसाइल है

उस को भी तो सज़ा मिले कोई
जो मिरी ख़्वाहिशों का क़ातिल है

पहले वो मुझ पे जाँ छिड़कता था
अब मिरे दुश्मनों में शामिल है

दस्त-ए-क़ातिल भला न क्यों लर्ज़ें
तीर का रुख़ जो सू-ए-बिस्मिल है

रहती दुनिया तलक ये कर्ब-ओ-बला
हक़्क़-ओ-बातिल में हद्द-ए-फ़ासिल है

होने वाला है कुछ बुरा शायद
आज-कल मुज़्तरिब मिरा दिल है

बाप बोला अदा करूँ कैसे
इस क़दर पानी गैस का बिल है

वो फ़सील-ए-अना गिरानी है
जो हमारे मियान हाइल है

एक दिन ग़म तो एक रोज़ ख़ुशी
बस यही ज़िंदगी का हासिल है

आज के दौर में जिसे देखो
मक़्सद-ए-ज़िंदगी से ग़ाफ़िल है

कैसे खाते हो शौक़ से 'नूरी'
ख़ाली फ़िलफ़िल से ये फ़लाफ़िल है