उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo jis ke aane hi se bazm raushni se bhar gai

वो जिस के आने ही से बज़्म रौशनी से भर गई

وہ جس کے آنے ہی سے بزم روشنی سے بھر گئی

शायर: Madhav Jha6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो जिस के आने ही से बज़्म रौशनी से भर गई
कहाँ से आई थी यहाँ वो कौन थी किधर गई

बदन भले हसीन था मगर तू मेरे वस्ल से
ज़रा तो देख आइने में किस क़दर निखर गई

हर एक शय हुई तबाह हर किसी का दिल हलाक
जिधर कहीं भी एक दफ़ा हुस्न की नज़र गई

मैं फ़ाइलों में इस क़दर कई दिनों से उलझा था
क़ज़ा भी आई इंतिज़ार कर के थक के घर गई

अमीर के बयानों को ही मानते हैं सच सभी
ये मुफ़्लिसी तो देखो मेरा ही शिकार कर गई

अगन बढ़ाना चाहता था हिज्र की मैं जिस क़दर
उधर बहार आई और वो मेरा काम कर गई