उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na munh mein ek niwala ja raha hai

न मुँह में इक निवाला जा रहा है

نہ منہ میں اک نوالہ جا رہا ہے

शायर: Madhav Jha5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न मुँह में इक निवाला जा रहा है
फ़क़त धोके में डाला जा रहा है

निकाला जा चुका हूँ दह्र से जब
तो क्यों दिल से निकाला जा रहा है

ये काफ़िर बस तुम्हें पाने की ख़ातिर
बहाने से शिवाला जा रहा है

तेरी यादें संजोता हूँ मैं ऐसे
कि जैसे साँप पाला जा रहा है

सफ़र मुश्किल समझिए बस वहाँ तक
जहाँ तक ये उजाला जा रहा है