उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo bas rassa-kashi thi

वो बस रस्सा-कशी थी

وہ بس رسہ کشی تھی

शायर: Dakhlan Bhopali11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो बस रस्सा-कशी थी
मोहब्बत थक चुकी थी

दो कश्ती में नदी थी
ज़मीं वीरान सी थी

अचानक क्या घटा था
मुझे हैरानगी थी

नज़र भर उस ने देखा
मैं समझा पारखी थी

किया सोने को मिट्टी
ग़ज़ब कूज़ा-गरी थी

बचाता कौन हम को
जबीं पर शल लिखी थी

हमें जिस ने डुबोया
हमारी सादगी थी

मसाफ़त ख़त्म थी पर
थकन ज़िंदा खड़ी थी

हवा ज़हरीली थी पर
बदन में चल रही थी

जिसे समझे थे जीना
फ़क़त वो ख़ुद-कुशी थी

मैं बस था नीम-बिस्मिल
मोहब्बत मर चुकी थी