उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo aaghaz-e-mohabbat ka zamana

वो आग़ाज़-ए-मोहब्बत का ज़माना

وہ آغاز محبت کا زمانہ

शायर: Qamar Jalalvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो आग़ाज़-ए-मोहब्बत का ज़माना
ज़रा सी बात बनती थी फ़साना

क़फ़स को क्यूँ समझ लूँ आशियाना
अभी तो करवटें लेगा ज़माना

ये कह कर सब्र करते हैं सितम पर
हमारा भी कभी होगा ज़माना

क़फ़स से भी निकाला जा रहा हूँ
कहाँ ले जाए देखो आब-ओ-दाना

ग़ुरूर इतना न कर तीर-ए-सितम पर
कि अक्सर चूक जाता है निशाना

अगर बिजली का डर होगा तो उन को
बुलंदी पर है जिन का आशियाना

कहानी दर्द-ए-दिल की सुन के पूछा
'क़मर' सच कह ये किस का है फ़साना