उर्दू शायरी · ग़ज़ल

virane mein ek din nikal aaenge shajar bhi

वीराने में इक दिन निकल आएँगे शजर भी

ویرانے میں اک دن نکل آئیں گے شجر بھی

शायर: M. Qamruddin7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वीराने में इक दिन निकल आएँगे शजर भी
फिर उन में निकल आएँगे गुल और समर भी

क्या समझूँ इसे वक़्त की ख़ूबी कि ख़राबी
होती है अगर शाम तो होती है सहर भी

हूँ मैं वो जिसे चाहिए भरपूर नज़ारा
हैं और वो काफ़ी है जिन्हें एक नज़र भी

तू बन के कोई फ़िक्र पहुँच 'अर्श पे लेकिन
फिर बन के कोई शे'र मिरे दिल में उतर भी

दो हर्फ़ों का इक लफ़्ज़ कोई पढ़ नहीं सकता
उस ने जो लगा रक्खा है ज़ेर और ज़बर भी

ऐ ज़िंदगी एक ऐसा कोई दिन भी कि जिस में
मुझ को न मिले कोई ख़बर अपनी ख़बर भी

ये मेरा वुजूद इस में कोई झाँक ले ऐ काश
मैं एक परिंदा भी हूँ और एक शजर भी