उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hai jo ek maraka faisal nahin hone deta

है जो इक मा'रका फ़ैसल नहीं होने देता

ہے جو اک معرکہ فیصل نہیں ہونے دیتا

शायर: M. Qamruddin9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

है जो इक मा'रका फ़ैसल नहीं होने देता
जिन वो हो के मुझे बोतल नहीं होने देता

क़त्ल इक रोज़ ही करता हूँ इसी गोशे में
और साबित इसे मक़्तल नहीं होने देता

ज़िद है उस की कि हर इक शाख़ हो फिर सब्ज़ ही सब्ज़
गरचे पैदा कोई कोंपल नहीं होने देता

रौशनी अपने ख़यालों ही से करनी होगी
कोई रौशन कहीं मश'अल नहीं होने देता

चूँ-कि मिट्टी की भी एक अपनी अलग ख़ुशबू है
मैं कहीं भी इसे संदल नहीं होने देता

इक परिंदा कि जो सहता है हवाओं का दबाओ
और परवाज़ को पैदल नहीं होने देता

डर है उस को नज़र आए न कहीं ज़ह्न का 'अक्स
वो मिरा आइना सैक़ल नहीं होने देता

तिरा क़ानून है जंगल का ग़नीमत है कि तू
मिरे इस शहर को जंगल नहीं होने देता

चलो बात उस की सुनें एक 'अजब मंतिक़ से
जो किसी बात को मुहमल नहीं होने देता