उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya apne shahr mein koi aisa makan hai

क्या अपने शहर में कोई ऐसा मकान है

کیا اپنے شہر میں کوئی ایسا مکان ہے

शायर: M. Qamruddin7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या अपने शहर में कोई ऐसा मकान है
समझूँ जिसे कि अस्ल में वो इक जहान है

ढूँडो हक़ीक़त इस में न अफ़्साना ही कोई
इस का बयान कुछ नहीं उस का बयान है

अपना शि'आर अब है फ़क़त अम्न-दुश्मनी
ये और बात फ़ाख़्ता अपना निशान है

लिखने को एक हर्फ़ न कहने को एक लफ़्ज़
यूँ तो क़लम है हाथ में मुँह में ज़बान है

वो लम्स जिस के बा'द ज़माने गुज़र गए
वो लम्स अब भी ताज़ा है अब भी जवान है

हो जाएगा यक़ीन सभों का ही कल जो आज
मेरा यक़ीन और सभों का गुमान है

शतरंज की बिसात कि थी अपनी मेज़ पर
शतरंज की बिसात कि सारा जहान है