उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kaam liya jab lafzon hi se KHud ko bas nakaam kiya

काम लिया जब लफ़्ज़ों ही से ख़ुद को बस नाकाम किया

کام لیا جب لفظوں ہی سے خود کو بس ناکام کیا

शायर: M. Qamruddin8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

काम लिया जब लफ़्ज़ों ही से ख़ुद को बस नाकाम किया
बात असर-अंदाज़ हुई जब शे'रों को पैग़ाम किया

ये कैसे सारी दुनिया में आज बहुत मशहूर हो तुम
वैसे तो सारी दुनिया ने तुम को बहुत गुमनाम किया

यक-रंगी से 'आजिज़ आ कर रंगा-रंगी की ख़ातिर
जो मुझ को रास आया था उस नीलम को नीलाम किया

अक्सर तन्हाई में मुझ को याद आ जाता है वो सब
हाँ आग़ाज़ से पहले ही जिस को मैं ने अंजाम किया

ख़ामोशी पस फ़न है ख़ुदा का सीखा हम ने भी लेकिन
हर-सू रोज़ मचाया तहलका या पैदा कोहराम किया

वक़्त के साथ और आप के हाथों क़द्रें कितनी बदली हैं
एक इल्ज़ाम से कितना कम है हासिल जो इन'आम किया

कहिए हुस्न और 'इश्क़ को दे कर अपने दिल के ख़ून का लम्स
किस ने उसे गुल-रंग किया फिर किस ने उसे गुलफ़ाम किया

अब का फ़साद आराम से गुज़रे इस कोशिश में उस ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया