उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kab zer kar sakunga kisi bhi zabar ko main

कब ज़ेर कर सकूँगा किसी भी ज़बर को मैं

کب زیر کر سکوں گا کسی بھی زبر کو میں

शायर: M. Qamruddin7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कब ज़ेर कर सकूँगा किसी भी ज़बर को मैं
मुमकिन है बस यही कि झुका लूँ नज़र को मैं

उस ने गुहर गुहर मिरा क़तरा किया मगर
क्यों क़तरा क़तरा करता हूँ उस के गुहर को मैं

वो सच भी मिल गया है जो मीठा है शहद से
कितना तरस गया हूँ इक ऐसी ख़बर को मैं

मैं ने बना लिया है मुसाहिब जो शह को अब
हैरत से देखता हूँ ख़ुद अपने हुनर को मैं

सरसब्ज़ रखना अपने पसीने से तू इसे
सींचूँगा अपने ख़ून से तेरे शजर को मैं

ऐ काश इस की रौशनियाँ तुम से कह सकें
तारीकियों में देख चुका था सहर को मैं

वक़्फ़ा मुझे मिला न मिले इक सफ़र के बा'द
क़दमों पे लाद लेता हूँ और इक सफ़र को मैं