उर्दू शायरी · ग़ज़ल

watan ko kuchh nahin KHatra nizam-e-zar hai KHatre mein

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में

وطن کو کچھ نہیں خطرہ نظام زر ہے خطرے میں

शायर: Habib Jalib4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम-ए-ज़र है ख़तरे में
हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर है ख़तरे में

जो बैठा है सफ़-ए-मातम बिछाए मर्ग-ए-ज़ुल्मत पर
वो नौहागर है ख़तरे में वो दानिश-वर है ख़तरे में

अगर तशवीश लाहक़ है तो सुलतानों को लाहक़ है
न तेरा घर है ख़तरे में न मेरा घर है ख़तरे में

जहाँ 'इक़बाल' भी नज़्र-ए-ख़त-ए-तनसीख़ हो 'जालिब'
वहाँ तुझ को शिकायत है तिरा जौहर है ख़तरे में