उर्दू शायरी · ग़ज़ल

apnon ne wo ranj diye hain begane yaad aate hain

अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं

اپنوں نے وہ رنج دئے ہیں بیگانے یاد آتے ہیں

शायर: Habib Jalib7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अपनों ने वो रंज दिए हैं बेगाने याद आते हैं
देख के उस बस्ती की हालत वीराने याद आते हैं

उस नगरी में क़दम क़दम पे सर को झुकाना पड़ता है
उस नगरी में क़दम क़दम पर बुत-ख़ाने याद आते हैं

आँखें पुर-नम हो जाती हैं ग़ुर्बत के सहराओं में
जब उस रिम-झिम की वादी के अफ़्साने याद आते हैं

ऐसे ऐसे दर्द मिले हैं नए दयारों में हम को
बिछड़े हुए कुछ लोग पुराने याराने याद आते हैं

जिन के कारन आज हमारे हाल पे दुनिया हँसती है
कितने ज़ालिम चेहरे जाने पहचाने याद आते हैं

यूँ न लुटी थी गलियों दौलत अपने अश्कों की
रोते हैं तो हम को अपने ग़म-ख़ाने याद आते हैं

कोई तो परचम ले कर निकले अपने गरेबाँ का 'जालिब'
चारों जानिब सन्नाटा है दीवाने याद आते हैं