उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wasl ka mausam ho to ye sardiyan hi Thik hain

वस्ल का मौसम हो तो ये सर्दियाँ ही ठीक हैं

وصل کا موسم ہو تو یہ سردیاں ہی ٹھیک ہیں

शायर: A.R. Sahil 'Aleeg'9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वस्ल का मौसम हो तो ये सर्दियाँ ही ठीक हैं
हिज्र में क़ुर्बत की ये परछाइयाँ ही ठीक हैं

क्या बताऊँ मैं कि तुम ने किस को सौंपी है हया
इस लिए सोचा मिरी ख़ामोशियाँ ही ठीक हैं

इश्क़ से बेज़ार दिल ये चीख़ कर कहने लगा
इश्क़ छोड़ो आशिक़ों तन्हाइयाँ ही ठीक हैं

इस क़दर हम हो चुके रुस्वा वफ़ा के नाम पर
अब शराफ़त छोड़ दी बद-नामियाँ ही ठीक हैं

आप ने चाहा जुदाई सो अलग हम हो गए
क्या कहें अब आप की ये मर्ज़ियाँ ही ठीक हैं

हो न पाए जब मुकम्मल इश्क़ का क़िस्सा तो फिर
शोहरतें रहने दो अब गुम-नामियाँ ही ठीक हैं

इस से पहले हम जुदा हों कुछ भरम बाक़ी रहे
दरमियाँ अब तल्ख़ सी ये दूरियाँ ही ठीक हैं

बुझ चुका जो क्यों वो सुलगाऊँ मोहब्बत का अलाव
अब तलक झेली जफ़ा की सख़्तियाँ ही ठीक हैं

है फ़साना इश्क़ का डूबा है साहिल अश्क में
मेरे मज़मूँ का ये उनवाँ तल्ख़ियाँ ही ठीक हैं