उर्दू शायरी · ग़ज़ल

Dhali jo raat bahut der muskurai saba

ढली जो रात बहुत देर मुस्कुराई सबा

ڈھلی جو رات بہت دیر مسکرائی صبا

शायर: A.R. Sahil 'Aleeg'9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ढली जो रात बहुत देर मुस्कुराई सबा
फ़ज़ा को दे के गई आज फिर बधाई सबा

भले ही आज चमन को तू रास आई सबा
गुलों के लब पे मगर है तिरी बुराई सबा

उठा के हाथ दुआ माँगने लगे हैं चराग़
तो कर रही है भला कैसी रहनुमाई सबा

चढ़ी जो धूप तो दामन झटक दिया उस ने
उफ़ुक़ से करने लगी खुल के बेवफ़ाई सबा

महक उठी है तमन्ना भी ज़ख़्म खाने की
कटार हाथ में ले कर गली में आई सबा

ग़ुबार ज़ेहन जिगर में उठा दिया ग़म का
सितम के शहर से सीधे ही दिल में आई सबा

अजीब ढंग की मस्ती है इन पहाड़ों की
बदन पर ओढ़ ली हँस कर कभी बिछाई सबा

गुलाब ख़्वाब सितारे धनक उदास चराग़
पड़ी है फ़स्ल-ए-मोहब्बत कटी-कटाई सबा

न जाने किस के इशारे पे रात-दिन 'साहिल'
सुना रही है कहानी सुनी-सुनाई सबा