उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kitab-e-zist mein aisa koi bhi bab nahin

किताब-ए-ज़ीस्त में ऐसा कोई भी बाब नहीं

کتاب زیست میں ایسا کوئی بھی باب نہیں

शायर: A.R. Sahil 'Aleeg'8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किताब-ए-ज़ीस्त में ऐसा कोई भी बाब नहीं
तुम्हारे 'इश्क़ का जिस पर लिखा हिसाब नहीं

शराब-ख़ाने में दो बूँद भी शराब नहीं
हमारे वास्ते इस से बड़ा 'अज़ाब नहीं

हुई ये ज़िंदगी तारीक रात के मानिंद
तू माहताब नहीं मैं भी आफ़्ताब नहीं

नई हयात में ढलना पड़ेगा अब इस को
ये ज़िंदगी तो मोहब्बत में कामयाब नहीं

तू अपनी आँखों का चश्मा बदल के देख मुझे
जहान जितना है इतना तो मैं ख़राब नहीं

हमें भी तर्क-ए-त'अल्लुक़ का ख़ाक हो अफ़सोस
बिछड़ के हम से तुम्हें भी तो इज़्तिराब नहीं

ये मय-कदा है यहाँ है हर एक शख़्स क़ुबूल
कोई शरीफ़ नहीं है कोई ख़राब नहीं

ख़िज़ाँ ने कौन सी तरतीब से किया बर्बाद
किसी भी शाख़ पे गुलशन में इक गुलाब नहीं