उर्दू शायरी · ग़ज़ल

waqt ke sath nai soch mein Dhal jate hain

वक़्त के साथ नई सोच में ढल जाते हैं

وقت کے ساتھ نئی سوچ میں ڈھل جاتے ہیں

शायर: Jahanzeb Sahir5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वक़्त के साथ नई सोच में ढल जाते हैं
हम वो सिक्के हैं जो हर दौर में चल जाते हैं

इतने मानूस हुए मुझ से मिरे घर के चराग़
शाम होते ही मुझे देख के जल जाते हैं

देख लेता हूँ जो कुछ देर तिरी आँखों को
तेरी आँखों से मिरे ख़्वाब बदल जाते हैं

इक तकल्लुफ़ में लिहाफ़ों का सहारा ले कर
आस्तीनों में छुपे साँप भी पल जाते हैं

वक़्त कब हाथ से जाता है किसी के 'साहिर'
वक़्त के हाथ से हम लोग निकल जाते हैं