उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hum aise log kahan manzilon ko pate hain

हम ऐसे लोग कहाँ मंज़िलों को पाते हैं

ہم ایسے لوگ کہاں منزلوں کو پاتے ہیں

शायर: Jahanzeb Sahir7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हम ऐसे लोग कहाँ मंज़िलों को पाते हैं
हम ऐसे लोग फ़क़त रास्ते बनाते हैं

ये तेरे जिस्म को छू कर पता चला है मुझे
कि नर्म फूल बहुत जल्द सूख जाते हैं

ये काम हिज्र में बिदअ'त शुमार होता है
मगर ये देख कि हम फिर भी मुस्कुराते हैं

तिरा तो ख़ैर कोई तुझ से दूर ही न गया
तुझे ख़बर ही नहीं साँस कैसे आते हैं

नज़र न आएँगे तुझ को ग़ुबार उड़ने दे
तिरे लिए जो मुझे राह से हटाते हैं

तुम्हारे ख़्वाब ग़नीमत हैं बुझती आँखों को
मगर ये ख़्वाब हमें नींद से जगाते हैं

ये कौन बाग़ में 'साहिर' दिखाई देने लगा
कि फूल पेड़ परिंदे ख़ुशी मनाते हैं