उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hawa mein tair rahe hain sahab miTTi ke

हवा में तैर रहे हैं सहाब मिट्टी के

ہوا میں تیر رہے ہیں سحاب مٹی کے

शायर: Jahanzeb Sahir8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हवा में तैर रहे हैं सहाब मिट्टी के
ज़मीं पे आएँगे इक दिन अज़ाब मिट्टी के

मुझे तो इस से कई आदमी बनाने थे
परिंद भी न बने दस्तियाब मिट्टी के

फ़लक से नूर की सूरत सवाल उतरे थे
दिए ज़मीन ने लेकिन जवाब मिट्टी के

ये किस जहान में मुझ को गुमान ले आया
उभर रहे हैं यहाँ आफ़्ताब मिट्टी के

फिर एक रोज़ उसे चाक पर उतारा गया
फिर उस के बा'द हुए दिन ख़राब मिट्टी के

किए गए थे हज़ारों ही तजरबात मगर
बदन रहे हैं फ़क़त कामयाब मिट्टी के

ये उस के नक़्श कफ़-ए-पा हैं और लगते हैं
ज़मीं पे जैसे खिले हों गुलाब मिट्टी के

किसी के वास्ते साहिर चराग़ थे लेकिन
हवा के हाथ पे रक्खे थे ख़्वाब मिट्टी के