उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wahshat-e-baam-o-dar se bhagte hain

वहशत-ए-बाम-ओ-दर से भागते हैं

وحشت بام و در سے بھاگتے ہیں

शायर: Badr Muneer7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वहशत-ए-बाम-ओ-दर से भागते हैं
जब कभी अपने घर से भागते हैं

हाथ मलता है दीदा-ए-हैराँ
लोग इतना हुनर से भागते हैं

जिस में कुछ भी बुरा नहीं लगता
ऐसे हुस्न-ए-नज़र से भागते हैं

मेरे इस शहर-ए-बे-यक़ीन के लोग
शोर से और शर से भागते हैं

ऐसा बदला मिज़ाज-ए-आब-ओ-हवा
पेड़ अपने समर से भागते हैं

क़हक़हों में जो थे शरीक वही
अब मिरी चश्म-ए-तर से भागते हैं

'बद्र' हम हैं ग़ज़ाल-ए-दश्त-ए-जुनूँ
वो जिधर हो उधर से भागते हैं