उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ain-mumkin hai ye zahmat bhi uThani paD jae

'ऐन-मुमकिन है ये ज़हमत भी उठानी पड़ जाए

عین ممکن ہے یہ زحمت بھی اٹھانی پڑ جائے

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

'ऐन-मुमकिन है ये ज़हमत भी उठानी पड़ जाए
बातों बातों में कोई बात छुपानी पड़ जाए

सोच कर और कोई ‘उज़्र भी रक्खें शायद
रू-ब-रू उस के ये तौजीह पुरानी पड़ जाए

दर-ब-दर फिरते हैं इस आस पे हम दिल-ज़दगाँ
किसी रस्ते में कोई शाम सुहानी पड़ जाए

मस्लहत ओढ़ने वालों को ये मा'लूम नहीं
अपने रस्ते की ये दीवार जो ढानी पड़ जाए

देखते हैं जिसे आईना-ए-दिल में अक्सर
वही तस्वीर जो दुनिया को दिखानी पड़ जाए

शहर के तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल से तो बेहतर है 'मुनीर'
अपने हिस्से में कोई नक़्ल-ए-मकानी पड़ जाए