उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aag jalti hai Khaar-o-KHas se pare

आग जलती है ख़ार-ओ-ख़स से परे

آگ جلتی ہے خار و خس سے پرے

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आग जलती है ख़ार-ओ-ख़स से परे
कोई बैठा है दस्तरस से परे

काश ऐसा कभी तो मुमकिन हो
उस को ले जाएँ पेश-ओ-पस से परे

क़ैद ऐसी है कुछ नहीं खुलता
हम क़फ़स में हैं या क़फ़स से परे

'उम्र में किस तरह शुमार करें
वक़्त गुज़रा जो हम-नफ़स से परे

उलझनें दिल की हो गईं मा'दूम
जा के देखा जो दाद-रस से परे

उस की क़ुर्बत में रह के ‘बद्र-मुनीर'
'इश्क़ रहता है हर हवस से परे