उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aksar Than bhi jati hai

अक्सर ठन भी जाती है

اکثر ٹھن بھی جاتی ہے

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

अक्सर ठन भी जाती है
बिगड़ी बन भी जाती है

उस के नाम की निस्बत से
गर्दन तन भी जाती है

‘इज्ज़ का दामन छोड़ें तो
हुर्मत-ए-फ़न भी जाती है

जब इंसाफ़ नहीं मिलता
हुब्ब-ए-वतन भी जाती है

सुख मिलता है यारों में
और थकन भी जाती है

वो जाए तो उस के साथ
मश्क़-ए-सुख़न भी जाती है