उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wafur-e-ishtiyaq mein zaban se kya nikal gaya

वफ़ूर-ए-इश्तियाक़ में ज़बाँ से क्या निकल गया

وفور اشتیاق میں زباں سے کیا نکل گیا

शायर: Badr Muneer6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वफ़ूर-ए-इश्तियाक़ में ज़बाँ से क्या निकल गया
फिर उस के बा'द बज़्म का मिज़ाज ही बदल गया

इधर-उधर के लोग तो करेंगे उस की परवरिश
ज़रा सा कोई ख़ौफ़ भी अगर दिलों में पल गया

हमारी रात जगमगा रही है आब-ओ-ताब से
ज़मीं का चाँद आसमाँ के चाँद को निगल गया

मकान से मकान तो हुए हैं मुत्तसिल मगर
ख़ुलूस जिस का नाम था वो शहर से निकल गया

ये भेद पूरे शहर को दिया है मैं ने इस लिए
कि होते होते बात का पता उसे भी चल गया

न-जाने उस घड़ी थी क्या दिल-ओ-नज़र की कैफ़ियत
छुआ जो मैं ने फूल को तो मेरा हाथ जल गया