उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wafa mein pech aisa paD gaya

वफ़ा में पेच ऐसा पड़ गया

وفا میں پیچ ایسا پڑ گیا

शायर: Fahmi Badayuni7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वफ़ा में पेच ऐसा पड़ गया
सितम सहने का चस्का पड़ गया

मु'आफ़ी माँगने वाला था वो
मुझे ग़ुस्से में हँसना पड़ गया

बजाए रोने के मैं हँस पड़ा
ग़मों का दाँव उल्टा पड़ गया

दवा तो हिज्र की महँगी न थी
मगर परहेज़ महँगा पड़ गया

मुझे देखो मैं संग-ए-मील था
मगर रस्ते से हटना पड़ गया

कभी सुलझाई जो उलझन कोई
नया एक और फंदा पड़ गया

सफ़र के पेच-ओ-ख़म याद आ गए
मुझे घर में भटकना पड़ गया