उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uThaya hi nahin jata jo bar-e-zindagi humse

उठाया ही नहीं जाता जो बार-ए-ज़िंदगी हम से

اٹھایا ہی نہیں جاتا جو بار زندگی ہم سے

शायर: Pandit Vidya Ratan Aasi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उठाया ही नहीं जाता जो बार-ए-ज़िंदगी हम से
किनारा कर चुकी शायद किसी की याद भी हम से

कभी मानूस थी कितनी बहार-ए-ज़िंदगी हम से
मगर दामन-कशाँ है आज-कल हर इक ख़ुशी हम से

शब-ए-ग़म इस तरह भी कट गई है बारहा अपनी
किसी की याद पहरों गुफ़्तुगू करती रही हम से

किसी के वास्ते तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ मश्ग़ला ठहरा
हमारे दिल पे जो गुज़री है वो पूछे कोई हम से

किसी को शाद-कामी है किसी को ना-मुरादी है
मिलेंगे राह-ए-उल्फ़त में कोई तुम से कोई हम से

तिरी चश्म-ए-करम की वो तवज्जोह ही नहीं वर्ना
कहाँ थी इस क़दर बरहम हमारी ज़िंदगी हम से

बसा-औक़ात हम ने मय-कदे के दर पे दस्तक दी
तबीअ'त जब किसी सूरत न बहलाई गई हम से

कहाँ तक ख़ुद-फ़रेबी में रहें हम मुब्तला 'आसी'
लबों पे लाई जा सकती नहीं झूटी हँसी हम से