उर्दू शायरी · ग़ज़ल

usko chhune ko kai hath nikal kar aae

उस को छूने को कई हाथ निकल कर आए

اس کو چھونے کو کئی ہاتھ نکل کر آئے

शायर: Kaleem Noori Firozabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उस को छूने को कई हाथ निकल कर आए
चाँद से किस ने कहा था कि वो छत पर आए

हो उठा फिर से सियासत में समुंदर मंथन
ज़हर पीने के लिए फिर कोई शंकर आए

तुम ने आँखें तो खुली रक्खी हैं अपनी लेकिन
दिल का दरवाज़ा खुले तब कोई अंदर आए

मैं तो फ़रहाद नहीं क़ैस भी राँझा भी नहीं
क्यूँ मिरी सम्त हर इक सम्त से पत्थर आए

ग़म में डूबी हुई ग़ज़लों के जो आँसू पोंछे
ऐसा कोई तो ज़माने में सुख़नवर आए

मैं वो दरिया हूँ जो घर से कभी निकला ही नहीं
प्यास ले कर मेरी चौखट पे समुंदर आए