उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kya jiyega koi hum KHak-nashinon ki tarah

क्या जियेगा कोई हम ख़ाक-नशीनों की तरह

کیا جئے گا کوئی ہم خاک نشینوں کی طرح

शायर: Kaleem Noori Firozabadi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

क्या जियेगा कोई हम ख़ाक-नशीनों की तरह
एक इक पल यहाँ गुज़रा है महीनों की तरह

उस ने चढ़ कर मिरे काँधों पे फ़लक चूम लिया
मैं ज़मीं पर ही खड़ा रह गया ज़ीनों की तरह

दौर-ए-हाज़िर में मोहब्बत का कोई मोल नहीं
दिल भी होने लगे नीलाम ज़मीनों की तरह

ख़ुद नहीं चलता कोई और चलाता है उसे
अब तो इंसान भी तुलता है मशीनों की तरह

जब से आया है फ़सादात के मौसम में उबाल
हम भी मौजों में घिरे टूटे सफ़ीनों की तरह

मैं ने दुनिया की निगाहों से बचा कर ऐ 'कलीम'
दिल में रक्खा तिरी यादों को दफ़ीनों की तरह