उर्दू शायरी · ग़ज़ल

un ka band-e-qaba ki wa na hua

उन का बंद-ए-क़बा कि वा न हुआ

ان کا بند قبا کہ وا نہ ہوا

शायर: Umair Khan Umair12 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उन का बंद-ए-क़बा कि वा न हुआ
तुझ से इतना भी ऐ सबा न हुआ

कब कहाँ जौर-आज़मा न हुआ
चर्ख़ तुझ सा मगर बुरा न हुआ

यूँ तो सरज़द ज़बाँ से क्या न हुआ
लेक शे'र इक भी नौशा सा न हुआ

उन का बंद-ए-क़बा कि वा न हुआ
इतना भी ऐ सबा रवा न हुआ

दिल बग़ल से गया न उस ने लिया
न हुआ घर का घाट का न हुआ

दर्द रश्क-ए-मसीह का है कि दिल
आज तक तालिब-ए-दवा न हुआ

गरचे पूजा किए बहुत 'उश्शाक़
बुत तो बुत ही रहा ख़ुदा न हुआ

सरकशी पर बुरा करेगा कुछ
मौलवी हो गया ख़ुदा न हुआ

'अदमिय्यत वुजूद की है मुहाल
ख़ाक मैं हो गया फ़ना न हुआ

सर खपाते तो मुँद गईं आँखें
'उक़्दा-ए-'इश्क़-ओ-'अक़्ल वा न हुआ

पी सके रेहन रख के शैख़ शराब
इतना जुब्बा गिराँ-बहा न हुआ

सेहर किल्क-ए-'उमैर' का है कि देख
आज 'ग़ालिब' ग़ज़ल-सरा न हुआ