उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kasa-e-dil le ke pahunche taliban-e-dard-e-dil

कासा-ए-दिल ले के पहुँचे तालिबान-ए-दर्द-ए-दिल

کاسۂ دل لے کے پہنچے طالبان درد دل

शायर: Umair Khan Umair14 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कासा-ए-दिल ले के पहुँचे तालिबान-ए-दर्द-ए-दिल
आँख वा कर खोल दी किस ने दुकान-ए-दर्द-ए-दिल

'इश्वा-ओ-नाज़-ओ-अदा हैं मालिकान-ए-दर्द-ए-दिल
जब जिसे चाहें ये दे दें अरमुग़ान-ए-दर्द-ए-दिल

क्या बताऊँ क्या है शान-ए-साएबान-ए-दर्द-ए-दिल
इक मकीन-ए-ला-मकाँ चाहे मकान-ए-दर्द-ए-दिल

तू हमा-तन-गोश हो के सुन बयान-ए-दर्द-ए-दिल
मैं कि बन जाऊँगा सर-ता-पा ज़बान-ए-दर्द-ए-दिल

इक से बढ़ के आए इक चारा-गरान-ए-दर्द-ए-दिल
मिट गए ख़ुद क्या मिटा नाम-ओ-निशान-ए-दर्द-ए-दिल

'अर्श तक जाने न दे आह-ओ-फ़ुग़ान-ए-दर्द-ए-दिल
चर्ख़-ए-रहज़न लूट ले है कारवान-ए-दर्द-ए-दिल

करती हैं फ़ाश आँखें जो राज़-ए-निहान-ए-दर्द-ए-दिल
दुश्मनान-ए-दर्द-ए-दिल हैं दुश्मनान-ए-दर्द-ए-दिल

क्यों सहर को सुन के शबनम से वुज़ू करते हैं फूल
ये फ़ुग़ान-ए-दर्द-ए-दिल है या अज़ान-ए-दर्द-ए-दिल

दर्द-ए-दिल भटके न क्यों तन-मन में बन के इज़्तिराब
ले उड़ा है इक बुत-ए-ग़ासिब मकान-ए-दर्द-ए-दिल

कर न दे बंद-ए-क़बा जूँ सीना-ए-गुल चाक चाक
मिस्ल-ए-बुलबुल है ज़बाँ पर दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल

सीना-ए-पुर-दाग़ मेरा देख कर कहते हैं वो
ये मकान-ए-दर्द-ए-दिल है या जहान-ए-दर्द-ए-दिल

जो गली में भीड़ का पूछा तो बोले हँस के वो
तालिबान-ए-दर्द-ए-दिल हैं तालिबान-ए-दर्द-ए-दिल

क्यों न होवेंगी ग़म-ए-फ़ुर्क़त की ख़ातिर-दारियाँ
मेहमान-ए-दर्द-ए-दिल है मेहमान-ए-दर्द-ए-दिल

पस्त-क़द रिफ़'अत को उस की पा सकेंगे क्या 'उमैर'
ये ज़मीन-ए-दर्द-ए-दिल है आसमान-ए-दर्द-ए-दिल