उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tera jalwa jo dam-ba-dam dekhte hain

तिरा जल्वा जो दम-ब-दम देखते हैं

ترا جلوہ جو دم بہ دم دیکھتے ہیں

शायर: Umair Khan Umair16 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तिरा जल्वा जो दम-ब-दम देखते हैं
ज़ियादा के धोके में कम देखते हैं

कब आग और पानी बहम देखते हैं
'अरक़ रुख़ पे जब तेरे हम देखते हैं

उन्हें ग़ैर के घर में हम देखते हैं
जहन्नुम में हूर-ए-इरम देखते हैं

तिरे रुख़ पे जब ज़ुल्फ़ हम देखते हैं
कि पस रात को दिन में ज़म देखते हैं

'अबस राह क़ासिद की हम देखते हैं
फिरे कब जो मुल्क-ए-'अदम देखते हैं

कहीं ख़ुल्द से वाँ मुकर ही न जाएँ
जो याँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं

बढ़ाते हो वा'इज़ यूँ महशर में गोया
वो करमों के बदले शिकम देखते हैं

'अदू भी किसी का न हो अल्लह हमनाम
बुलाते हैं उस को तो हम देखते हैं

वो भूले से मस्जिद में क्या आए इक बार
कि रह रोज़ शैख़-ए-हरम देखते हैं

तिरा तीर-ए-मिज़्गाँ कि है मो'जिज़ा-साज़
कमाँ में है और दिल में ज़म देखते हैं

कभी शाह-रग से निकल आँख में आ
कभी देख वो भी जो हम देखते हैं

बुलाते हैं हम बेवफ़ा जो किसी को
हुज़ूर आप क्यों एक दम देखते हैं

लहद पर मिरी आए हैं ग़ैर के साथ
करम भी ब-रंग-ए-सितम देखते हैं

जहन्नुम में क्या देखने को रहा अब
यहीं अहल-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं

जो देते हैं जाँ के 'एवज़ बोसा तो लो
जो अच्छी हो शय तो दिरम देखते हैं

नज़र-बाज़ों की क्या ख़ता है 'उमैर' अब
उन्हें अंधे भी दम-ब-दम देखते हैं