उर्दू शायरी · ग़ज़ल

umr bhar jis ki mohabbat mein giraftar rahi

उम्र भर जिस की मोहब्बत में गिरफ़्तार रही

عمر بھر جس کی محبت میں گرفتار رہی

शायर: Jahan Ara Tabassum6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उम्र भर जिस की मोहब्बत में गिरफ़्तार रही
उस को दीवार किया ख़ुद पस-ए-दीवार रही

आँख लग जाए तो फिर आँख कहाँ लगती है
मैं अगर सो भी गई ख़्वाब में बेदार रही

तीरगी से मिरा समझौता नहीं हो सकता
मैं हमेशा से चराग़ों की तरफ़-दार रही

बाग़बानों को पशेमानी इसी बात की है
मैं ख़िज़ाओं के दिनों में भी समर-बार रही

तू तो कम-हौसला मत जान मुझे ऐ दुनिया
तुझ से तो हर घड़ी मैं बरसर-ए-पैकार रही

मेरे चेहरे पे 'तबस्सुम' की हक़ीक़त न खुली
मैं ज़माने के लिए कितनी पुर-असरार रही