उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek lamha-e-visal se aage nikal gai

इक लम्हा-ए-विसाल से आगे निकल गई

اک لمحۂ وصال سے آگے نکل گئی

शायर: Jahan Ara Tabassum6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

इक लम्हा-ए-विसाल से आगे निकल गई
मैं ख़्वाहिशों के जाल से आगे निकल गई

चेहरे पे उस के रंज के आसार देख कर
चुप-चाप हर सवाल से आगे निकल गई

कुछ मैं भी ना-शनास थी इस कार-ए-ख़ैर में
हर रंज हर मलाल से आगे निकल गई

ऐसे ग़म-ए-हयात ने बाँहों में ले लिया
मैं अपनी देख-भाल से आगे निकल गई

कुछ दिन तिरे विसाल ने मदहोश कर दिया
मैं ख़्वाहिश-ए-मआल से आगे निकल गई

तू भी मिरे वजूद से आज़ाद हो गया
मैं भी तिरे ख़याल से आगे निकल गई