उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tu ne apna jalwa dikhane ko jo naqab munh se uTha diya

तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दिया

تو نے اپنا جلوہ دکھانے کو جو نقاب منہ سے اٹھا دیا

शायर: श्रेय पुष्ट नहीं4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तू ने अपना जल्वा दिखाने को जो नक़ाब मुँह से उठा दिया
वहीं महव-ए-हैरत-ए-बे-ख़ुदी मुझे आइना सा बना दिया

वो जो नक़्श-ए-पा की तरह रही थी नुमूद अपने वजूद की
सो कशिश ने दामन-ए-नाज़ की उसे भी ज़मीं से मिटा दिया

रग-ओ-पै में आग भड़क उठी फुंके है पड़ा ये सभी बदन
मुझे साक़िया मय-ए-आतिशीं का ये जाम कैसा पिला दिया

जभी जा के मकतब-ए-इश्क़ में सबक़-ए-मक़ाम-ए-फ़ना लिया
जो लिखा पढ़ा था 'नियाज़' ने सो वो साफ़ दिल से भुला दिया