उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tumhaari zulf ke charche pareshanon mein rahte hain

तुम्हारी ज़ुल्फ़ के चर्चे परेशानों में रहते हैं

تمہاری زلف کے چرچے پریشانوں میں رہتے ہیں

शायर: Radhe Shiyam Rastogi Ahqar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम्हारी ज़ुल्फ़ के चर्चे परेशानों में रहते हैं
मिरी दीवानगी के ज़िक्र दीवानों में रहते हैं

नहीं परवा-ए-ईमाँ काफ़िरान-ए-इश्क़ को हरगिज़
उन्हें का'बा से क्या मतलब जो बुतख़ानों में रहते हैं

तलाश उस रश्क-ए-लैला की जो रहती है हमें हर-दम
उसी से क़ैस के मानिंद वो वीरानों में रहते हैं

मियान-ए-महफ़िल-ए-अहबाब है वो शम' की सूरत
हम उस से लौ लगाए उस के परवानों में रहते हैं

फ़लक से बढ़ के रुत्बा हो न क्यूँ कर क़स्र-ए-जानाँ का
मलाएक जिस जगह अदना से दरबानों में रहते हैं

'अजब है नेक सोहबत की न होता सैर इंसाँ में
मुहज़्ज़ब बनते हैं हैवान जो इंसानों में रहते हैं

न हो मज़मून 'आली क्यूँ भला अश'आर 'अहक़र' में
सुख़न-दानों से सोहबत है ज़बाँ-दानों में रहते हैं