उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tum mein jo baat hai wo baat nahin aai hai

तुम में जो बात है वो बात नहीं आई है

تم میں جو بات ہے وہ بات نہیں آئی ہے

शायर: Qamar Jalalvi11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तुम में जो बात है वो बात नहीं आई है
क्या ये तस्वीर किसी ग़ैर से खिंचवाई है

देखें कैसा तुम्हें दा'वा-ए-मसीहाई है
आज बीमार ने मरने की क़सम खाई है

बस ये रूदाद-ए-मोहब्बत यहीं रहने दीजे
आगे कहता हूँ तो सरकार की रुस्वाई है

कसरत-ए-रंज-ओ-अलम यास-ओ-तमन्ना का हुजूम
कितने हंगामों की मेहमाँ मिरी तन्हाई है

क्यों सुनाऊँ मैं तुझे वा'दा-ख़िलाफ़ी तेरी
क्यों कहलवाऊँ कि दीवाना है सौदाई है

ख़ूब सय्याद सता जौर कर ईज़ा पहुँचा
अब तो तक़दीर तिरे दाम में ले आई है

गोशा-ए-चशम से बाहर हुई सुरमे की लकीर
ख़ैर हो म्यान से तलवार निकल आई है

बे-कसी में भी मरीज़ उन का अकेला न रहे
वो उधर उठ के गए और क़ज़ा आई है

महफ़िल-ए-ग़ैर में ऐ अश्क न आँखों से निकल
तेरे पर्दे में किसी शोख़ की रुस्वाई है

क़तरा-ए-ख़ूँ मिरे इस सोख़्ता दिल में है कहाँ
कोई हसरत तिरे पैकाँ से लिपट आई है

ऐ 'क़मर' छुप के वो आएँ भी तो क्यूँकर आएँ
चाँदनी आज सर-ए-शाम निकल आई है